बुधवार, 10 मार्च 2010

एक खुबसूरत सुबह थी वो


सुबह के खूबसूरत लम्हे ,

सुरमई सड़कों पे कुछ पत्ते गिरे हुए थे,

पेड़ भी ख्वाब आलूद कुछ नींद में मालूम होते थे,

आसमां ने ज़मीं को ग़ौर से देखा ,

ज़मीन भी खिलखिला के हंस पड़ी जैसे ,

परिंदे भी साथ देने लगे ,

वो भी कुछ गुनगुनाने लगे ,

नर्म बहती हवा का एक झोंका ,

मेरे गलों को छू सा गया ,

शायद कोई पैग़ाम था वो,

बे निशान बे नाम था वो,

फूलों ने गुसले सेहत किया था जैसे ,

उनके नाज़ुक बदनों से

कुछ फिसलते हुए कतरे ,

नीचे सब्ज़ घांस में में जज़्ब हो रहे थे ,

मैं भी उनके पास जा के बैठ गया ,

ख़ामोशी से बातें करने लगा,

फिर अचानक ये ख्याल दिल में आया,

ऐ खुदा तेरी दुनिया भी जन्नत है ,तो तेरी जन्नत क्या है ?

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